रोशनी गायब हो गई, मगर अंदाज से टटोलते हुए ये दोनों भी उस गड्ढ़े के मुंह पर पहुंच गए जिसमें वह औरत उतर गई थी। उस पर एक पत्थर अटकाया हुआ था, लेकिन उन अनगढ़ पत्थर के अगल-बगल छोटे-छोटे ऐसे सुराख थे जिनके जरिए से गड्ढे़ के अंदर का हाल ये दोनों बखूबी देख सकते थे।
दोनों उसी जगल बैठ गए और सुराखों की राह से अंदर का हाल देखने लगे। भीतर रोशनी बखूबी थी। सामने की तरफ चट्टान पर बैठी वही औरत दिखाई पड़ी जिसने अभी तक अपने मुंह से नकाब नहीं उतारी थी और थकावट के सबब लम्बी सांस ले रही थी। उसके पास ही एक कमसिन खूबसूरत हब्शी छोकरी बड़ा-सा छुरा हाथ में लिए खड़ी थी, दूसरी तरफ एक बदसूरत हब्शी कुदाल से जमीन खोद रहा था, बीच में छत के सहारे एक उल्टी लाश लटक रही था, एक तरफ कोने में जल से भरा हुअा मिट्टी का घड़ा, एक लोटा और कुछ खाने का सामान पड़ा हुआ था।
कुछ देर बाद उस औरत ने अपने मुंह से नकाब उतारा। अहा, क्या खूबसूरत, गुलाब-सा चेहरा है, मगर गुस्से से आंखे ऐसी सुर्ख और भयानक हो रही हैं कि देखने से डर मालूम पड़ता है। वह औरत उठ खड़ी हुई और अपने पास वाली छोकरी के हाथ से छुरा ले उस लटकती हुई लाश के पास पहुंची और दो अंगुल गहरी एक लकीर उसके पीठ पर खींची।
हाय-हाय, ऐसी हसनी और इतनी संगदिली! इतनी बेदर्दी! अभी अभी एक खून किए चली आती है और यहां पहुंचकर फिर अपने राक्षसीपन का नमूना दिखला रही है! यह लाश किसकी है? कहीं यह भी कोई चुनार का खैरख्वाह तो नहीं।
पीठ पर जख्म खाते ही लाश फड़की। अब मालूम हुआ कि वह मुर्दा नहीं है, कोई जीता आदमी तकलीफ देने के लिए लटकाया गया है। जख्म खाकर लटका हुआ वह आदमी तड़पा और आह-भर बोला-
'हाय, मुझे क्यों तकलीफ देती हो, मैं कुछ नहीं जानता!'
औरत- नहीं, तुझे बताना ही होगा। तू खूब जानता है। (पीठ पर फिर गहरी छुरी चलाकर) बता बता!
उल्टा आदमी- हाय मुझे एक दफे क्यों नहीं मार डालती? मैं किसी का हाल क्या जानूं, मुझे इंद्रजीत सिंह से क्या वास्ता?
औरत- (फिर छुरी से काटकर) मैं खूब जानती हूं, तु बड़ा पाजी है, तुजे सब-कुछ मालूम है। बता, नहीं तो गोश्त काट-काटकर मैं जमीन पर गिरा दूंगी।
उल्टा आदमी- हाय, इंद्रजीत सिंह की बदौलत मेरी यह दशा!
अभी तक कुंवर आनंद सिंह और वह सिपाही छिपे सब कुछ देख रहे थे, मगर जब उस उल्टे हुए आदमी के मुंह से यह निकला कि 'हाय! इंद्रजीत सिंह की बदौलत मेरी यह दशा!' तब मारे गुस्से के उनकी आंखों में खून उतर आया। पत्थर हटा दोनों आदमी बेधड़क अंदर चले गए और उस बेदर्द छुरी चलाने वाली औरत के सामने पहुंच आनंद सिंह ने ललकारा-'खबरदार! रख दे छुरा हाथ से!'
औरत- (चौंककर) है, तुम यहां क्यों चले आए? खैर, अगर आ ही गए तो चुपचाप खड़े होकर तमाशा देखो। यह न समझो कि तुम्हारे धमकाने से मैं डर जाऊंगी (सिपाही की तरफ देखकर) तु्म्हारी आंखों में भी क्या धूल पड़ गई है? अपने हाकिम को नहीं पहचानते?
सिपाही- (खूब गौर से देखकर) हां, ठीक है, तुम्हारी सब बातें अनोखी होती हैं।
औरत- अच्छा तो आप दोनों आदमी यहां से जाइए और मेरे काम में हर्ज न डालिए।
सिपाही- (आनंद सिंह से) चलिए, इन्हें छोड़ दीजिए। जो चाहे सो करें, आपका क्या?
आनंद सिंह- (कमर से नीमचा निकालकर) वाह, क्या कहना है! मैं बिना इस आदमी को छुड़ाए कब टलने वाला हूं!
औरत- (हंसकर) मुंह धो लीजिए!
बहादुर वीरेंद्र सिंह के बहादुर लड़के आनंद सिंह को ऐसी बातों के सुनने का धैर्य कहां?
वह दो-चार आदमियों को समझते ही क्या थे? 'मुंह धो लीजिए' इतना सुनते ही जोश चढ़ आया। उछलकर एक हाथ नीमचे का लगाया जिससे वह रस्सी कट गई जो उस आमी के पैस से बंधी हुई थी और जिसके सहारे वह लटक रहा था, साथ ही फुर्ती से उस आदमी को सम्हाला और जोर से जमीन पर गिरने न दिया।
अब तो वह सिपाही भी आनंद सिंह का दुश्मन बन बैठा और ललकार कर बोला- 'यह क्या लड़कपन है!'
इस सुरंग में दो औरतें और एक हब्शी गुलाम हैं। अब वह सिपाही भी उनके साथ मिल गया और चारों ने आनंद सिंह को पकड़ लिया, मगर आनंद सिंह ने एक झटका दिया कि चारों दूर जा गिरे। इतने में बाहर से आवाज आई-'आनंद सिंह खबरदार! जो किया सो किया, अब आगे कुछ हौसला न करना, नहीं तो सजा पाओगे!'
आनंद सिंह से घबराकर बाहर की तरफ देखा तो एक योगिनी पर नजर पड़ी जो जटा बढ़ाए भस्म लगाए गेरुआ वस्त्र पहने दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में आग से भरा धधकता हुआ खप्पर जिसमें कोई खुशबूदार चीज चल रही थी और बहुत धुआं निकल रहा था, लिए हुए आ मौजूद हुई।
ताज्जुब में आकर सभी उसकी सूरत देखने लगे। थोड़ी देर में उस खप्पर से निकला हुआ धुआं सुरंग की खोटरी में भर गया और उसके असर से जितने वहां थे सभी बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े। बस, अकेली वह योगिनी होश में रही जिसने सभी को बेहोश देख कोने में पड़े हुए घड़े से जल निकाल खप्पर की आग बुझा दी।
24 फ़रवरी, 2010
23 फ़रवरी, 2010
चंद्रकांता संतति - भाग 14
आनंद सिंह- चुनार यहां से कितनी दूर और किस तरफ है?
सिपाही- चुनार यहां से बीस कोस है। चलिए, मैं आपके साथ चलता हूं, इन घोड़ों में इतनी ताकत है कि सवेरा होते-होते हम लोगों को चुनार पहुंचा दे। आप घर चलिए, इंद्रजीत सिंह के लिए कुछ फिक्र न कीजिए, उनका पता भी बहुत जल्द लग जाएगा, आपके ऐयार लोग उनकी खोज में निकले हुए हैं।
आनंद सिंह- ये घोड़े कहां से लाए?
सिपाही- कहीं से चुरा लाए, इसका कौन ठिकाना है?
आनंद सिंह- खैर यह तो बताओ तुम कौन हो और तुम्हारा नाम क्या है?
सिपाही- यह मैं नहीं बता सकता और न आपको इसके बारे में कुछ पूछना मुनासिब ही है।
आनंद सिंह- खैर अगर कहने में कुछ हर्ज है तो...
आनंद सिंह अपना पूरा मतलब कहने भी ने पाए थे कि कोई चौंकाने वाली चीज इन्हें नजर आई। स्याह कपड़ा पहने हुए किसी को अपनी तरफ आते देखा। सिपाही और आनंद सिंह दोनों एक पेड़ की आढ़ में गए और वह आदमी इनके पास ही से कुछ बड़बड़ाता हुआ निकल गया जिसे यह गुमान भी न था कि इस जगह पर कोई छिपा हुआ मुझे देख रहा है।
उसकी बड़बड़ाहट इन दोनों ने सुनी, वह कहता जाता था- 'अब मेरा कलेजा ठंडा हुआ, अब मैं घर जाकर बेशक सुख की नींद सोऊंगी और उसकी लाश को गीदड़ और कौवे कल दिन भर में खा जाएंगे जिसने मुझे औरत जानकर दबाना चाहा था और यह न समझा था कि इस और का दिल हजार मर्दों से भी बढ़कर है!'
आनंद सिंह और सिपाही दोनों उसकी तरफ टकटकी लगाए देखते रहे जिसकी बकवास से मालूम हो गया ता कि कोई और है, वह देखते-देखते नजरों से गायब हो गई।
सिपाही- बेशक इसने कोई खून किया है।
आनंद सिंह- और वह भी इसी जगह कहीं पास में। खोजने से जरूर पता लगेगा।
दोनों आदमी इधर-उधर ढूंढ़ने लगे, बहुत तकलीफ करने की नौबत न आई और दस ही कदम पर तड़पती हुई लाश पर इन दोनों की नजर पड़ी।
सिपाही ने अपने बगल से एक थैली निकाली और चकमक पत्थर से आग झाड़ मोमबत्ती जला उस तड़पती हुई लाश को देखा। मालूम हुआ कि किसी कटार या खंजर इसके कलेजे के पार कर दिया है, खून बराबर बह रहा है, जख्मी पैर पटकता और बोलने की कोशिश करता है, मगर बोला नहीं जाता।
सिपाही ने अपनी थैली से एक छोटी बोतल निकाली जिसमें किसी तरह का अर्क भरा हुआ था। इसमें से थोड़ा अर्क जख्मी के मुंह में डाला। गले के नीचे उतरते ही उसमें कुछ बोलने की ताकत आई और बहुत ही धीमी आवाज से उसने नीचे लिखे हुए कई टूटे-फूटे शब्द अपने मुंह से निकालने के साथ ही दम तोड़ दिया-
'अ...सोस, यह खूबसूरत पिशाची... तेज सिंह... की... जान मेरी तरह उसके फंदे में हाय! ... इंद्रजीत सिंह...!'
सिपाही- चुनार यहां से बीस कोस है। चलिए, मैं आपके साथ चलता हूं, इन घोड़ों में इतनी ताकत है कि सवेरा होते-होते हम लोगों को चुनार पहुंचा दे। आप घर चलिए, इंद्रजीत सिंह के लिए कुछ फिक्र न कीजिए, उनका पता भी बहुत जल्द लग जाएगा, आपके ऐयार लोग उनकी खोज में निकले हुए हैं।
आनंद सिंह- ये घोड़े कहां से लाए?
सिपाही- कहीं से चुरा लाए, इसका कौन ठिकाना है?
आनंद सिंह- खैर यह तो बताओ तुम कौन हो और तुम्हारा नाम क्या है?
सिपाही- यह मैं नहीं बता सकता और न आपको इसके बारे में कुछ पूछना मुनासिब ही है।
आनंद सिंह- खैर अगर कहने में कुछ हर्ज है तो...
आनंद सिंह अपना पूरा मतलब कहने भी ने पाए थे कि कोई चौंकाने वाली चीज इन्हें नजर आई। स्याह कपड़ा पहने हुए किसी को अपनी तरफ आते देखा। सिपाही और आनंद सिंह दोनों एक पेड़ की आढ़ में गए और वह आदमी इनके पास ही से कुछ बड़बड़ाता हुआ निकल गया जिसे यह गुमान भी न था कि इस जगह पर कोई छिपा हुआ मुझे देख रहा है।
उसकी बड़बड़ाहट इन दोनों ने सुनी, वह कहता जाता था- 'अब मेरा कलेजा ठंडा हुआ, अब मैं घर जाकर बेशक सुख की नींद सोऊंगी और उसकी लाश को गीदड़ और कौवे कल दिन भर में खा जाएंगे जिसने मुझे औरत जानकर दबाना चाहा था और यह न समझा था कि इस और का दिल हजार मर्दों से भी बढ़कर है!'
आनंद सिंह और सिपाही दोनों उसकी तरफ टकटकी लगाए देखते रहे जिसकी बकवास से मालूम हो गया ता कि कोई और है, वह देखते-देखते नजरों से गायब हो गई।
सिपाही- बेशक इसने कोई खून किया है।
आनंद सिंह- और वह भी इसी जगह कहीं पास में। खोजने से जरूर पता लगेगा।
दोनों आदमी इधर-उधर ढूंढ़ने लगे, बहुत तकलीफ करने की नौबत न आई और दस ही कदम पर तड़पती हुई लाश पर इन दोनों की नजर पड़ी।
सिपाही ने अपने बगल से एक थैली निकाली और चकमक पत्थर से आग झाड़ मोमबत्ती जला उस तड़पती हुई लाश को देखा। मालूम हुआ कि किसी कटार या खंजर इसके कलेजे के पार कर दिया है, खून बराबर बह रहा है, जख्मी पैर पटकता और बोलने की कोशिश करता है, मगर बोला नहीं जाता।
सिपाही ने अपनी थैली से एक छोटी बोतल निकाली जिसमें किसी तरह का अर्क भरा हुआ था। इसमें से थोड़ा अर्क जख्मी के मुंह में डाला। गले के नीचे उतरते ही उसमें कुछ बोलने की ताकत आई और बहुत ही धीमी आवाज से उसने नीचे लिखे हुए कई टूटे-फूटे शब्द अपने मुंह से निकालने के साथ ही दम तोड़ दिया-
'अ...सोस, यह खूबसूरत पिशाची... तेज सिंह... की... जान मेरी तरह उसके फंदे में हाय! ... इंद्रजीत सिंह...!'
उस बेचारे मरने वाले के मुंह से निकले हुए ये दो-चार शब्द बेजोड़ क्यों न हों, मगर इन दोनों सुनने वालों के दिलों को तड़पा देने के लिए काफी थे। आनंद सिंह से ज्यादा उस सिपाही को बेचैनी हुई जो अपने में बहुत कुछ कर गुजरने की कुदरत रखता था और जानता था कि इस वक्त अगर कोई हाथ कुंअर इंद्रजीत सिंह और तेज सिंह की मदद को बढ़ सकता है तो वह सिर्फ मेरी ही हाथ है।
सिपाही- कुमार, अब आप जाइए। इन टूटी-फूटी बेजोड़, मगर मतलब से भरी बातों को जो इस मरने वाले के मुंह से अनायास निकल पड़ी है सुनकर निश्चय हो गया कि आपके बड़े भाई और ऐयारों के सिरताज तेज सिंह किसी ऐसी आफत में, जो बहुत जल्द तबाह कर देने की कुदरत रखती है, फंस गए हैं। ऐसी हालत में मैं जो बहुत-कुछ कर गुजरने का हौसला रखता हूं किसी तरह नहीं अटक सकता और मेरा मतलब तभी सिद्ध होगा जब उस औरत को खोज निकालूंगा और जो अभी यह आफत कर गई और आगे कई तरह के फसाद करने वाली है।
आनंद सिंह- तुम्हारा कहना सही है, मगर क्या तुम कह सकते हो कि ऐसी खबर पाकर मैं चुपचाप घर चले जाना पसंद करूंगा और जान से ज्यादे प्यारों की मदद से जी चुराऊंगा?
सिपाही- (कुछ सोचकर) अच्छा, तो ज्यादे बात करने का मौका नहीं है, चलिए। हां, सुनिए तो आपके पास कोई हथियार तो है नहीं, काम पड़ने पर क्या कर सकेंगे? मेरे पास एक खंजर और एक नीमचा है, दोनों में जो चाहें एक आप ले लें।
आनंद सिंह- बस नीमचा मेरे हवाले कीजिए और चलिए!
आनंद सिंह ने नीमचा अपनी कमर में लगाया और सिपाही के साथ पैदल ही उस तरफ बढ़ चले जिधर वह खूनी औरत बकती हुई चली गई थी।
ये दोनों ठीक उसी पगडंडी के रास्ते को पकड़े हुए थे जिस पर वह औरत गई थी। थोड़ी-थोड़ी दूर पर सांस रोककर इधर-उधऱ की आहट लेते, जब कुछ मालूम न होता तो फिर तेजी के साथ बढ़ जाते।
कोस-भर के बाद पहाड़ी उतरने की नौबत पहुंची, वहां ये दोनों फिर रुके और चारों तरफ देखने लगे। छोटी सी घंटी बजने की आवाज आई। घंटी किसी खोह या गड्ढ़े के अंदर बजाई गई थी जो वहां से बहुत करीब थी जहां ये दोनों बहादुर खड़े हो इधर-उधर देख रहे थे।
ये दोनों उसी तरफ मुड़े जिधर से घंटी की आवाज आई थी। फिर आवाज आई, अब तो ये दोनों उस खोह के मुंह पर पहुंच गए जो पहाड़ी की कुछ ढाल उतरकर पगडंडी के रास्ते से बाईं तरफ हटकर थी और जिसके अंदर से घंटी की आवाज आई थी। बेधड़क दोनों आदमी खोह के अंदर घुस गए।
अब फिर एक बार घंटी बजने की आवाज आई और साथ ही एक रोशनी भी चमकती हुई दिखाई दी जिसकी वजह से उस खोह का रास्ता साफ मालूम होने लगा, बल्कि उन दोनों ने देखा कि कुछ दूर आगे एक औरत खड़ी है जो रोशनी होते ही बाईं तरफ हटकर किसी दूसरे गड्ढ़े में उतर गई जिसका रास्ता बहुत छोटा, बल्कि एक ही आदमी के जाने लायक था। इन दोनों को विश्वास हो गया कि यह वही औरत है जिसकी खोज में हम लोग इधर आए हैं।
सिपाही- कुमार, अब आप जाइए। इन टूटी-फूटी बेजोड़, मगर मतलब से भरी बातों को जो इस मरने वाले के मुंह से अनायास निकल पड़ी है सुनकर निश्चय हो गया कि आपके बड़े भाई और ऐयारों के सिरताज तेज सिंह किसी ऐसी आफत में, जो बहुत जल्द तबाह कर देने की कुदरत रखती है, फंस गए हैं। ऐसी हालत में मैं जो बहुत-कुछ कर गुजरने का हौसला रखता हूं किसी तरह नहीं अटक सकता और मेरा मतलब तभी सिद्ध होगा जब उस औरत को खोज निकालूंगा और जो अभी यह आफत कर गई और आगे कई तरह के फसाद करने वाली है।
आनंद सिंह- तुम्हारा कहना सही है, मगर क्या तुम कह सकते हो कि ऐसी खबर पाकर मैं चुपचाप घर चले जाना पसंद करूंगा और जान से ज्यादे प्यारों की मदद से जी चुराऊंगा?
सिपाही- (कुछ सोचकर) अच्छा, तो ज्यादे बात करने का मौका नहीं है, चलिए। हां, सुनिए तो आपके पास कोई हथियार तो है नहीं, काम पड़ने पर क्या कर सकेंगे? मेरे पास एक खंजर और एक नीमचा है, दोनों में जो चाहें एक आप ले लें।
आनंद सिंह- बस नीमचा मेरे हवाले कीजिए और चलिए!
आनंद सिंह ने नीमचा अपनी कमर में लगाया और सिपाही के साथ पैदल ही उस तरफ बढ़ चले जिधर वह खूनी औरत बकती हुई चली गई थी।
ये दोनों ठीक उसी पगडंडी के रास्ते को पकड़े हुए थे जिस पर वह औरत गई थी। थोड़ी-थोड़ी दूर पर सांस रोककर इधर-उधऱ की आहट लेते, जब कुछ मालूम न होता तो फिर तेजी के साथ बढ़ जाते।
कोस-भर के बाद पहाड़ी उतरने की नौबत पहुंची, वहां ये दोनों फिर रुके और चारों तरफ देखने लगे। छोटी सी घंटी बजने की आवाज आई। घंटी किसी खोह या गड्ढ़े के अंदर बजाई गई थी जो वहां से बहुत करीब थी जहां ये दोनों बहादुर खड़े हो इधर-उधर देख रहे थे।
ये दोनों उसी तरफ मुड़े जिधर से घंटी की आवाज आई थी। फिर आवाज आई, अब तो ये दोनों उस खोह के मुंह पर पहुंच गए जो पहाड़ी की कुछ ढाल उतरकर पगडंडी के रास्ते से बाईं तरफ हटकर थी और जिसके अंदर से घंटी की आवाज आई थी। बेधड़क दोनों आदमी खोह के अंदर घुस गए।
अब फिर एक बार घंटी बजने की आवाज आई और साथ ही एक रोशनी भी चमकती हुई दिखाई दी जिसकी वजह से उस खोह का रास्ता साफ मालूम होने लगा, बल्कि उन दोनों ने देखा कि कुछ दूर आगे एक औरत खड़ी है जो रोशनी होते ही बाईं तरफ हटकर किसी दूसरे गड्ढ़े में उतर गई जिसका रास्ता बहुत छोटा, बल्कि एक ही आदमी के जाने लायक था। इन दोनों को विश्वास हो गया कि यह वही औरत है जिसकी खोज में हम लोग इधर आए हैं।
22 फ़रवरी, 2010
चंद्रकांता संतति - भाग 13
आनंद सिंह- जो कहिए, दूंगा।
सिपाही- आपके पास क्या है जो मुझे देंगे?
आनंद सिंह- इस वक्त भी हजारों रुपए का माल मेरे बदन पर है।
सिपाही- मैं यह सब कुछ नहीं चाहता।
आनंद सिंह- फिर?
सिपाही- उसी कम्बख्त के बदन पर जो कुछ जेवर है मुझे दीजिए और एक हजार अशर्फी।
आनंद सिंह- यह कैसे हो सकेगा? वह तो यहां मौजूद नहीं और हजार अशर्फी भी कहां से आवें?
सिपाही- उसी से लेकर दीजिए।
आनंद सिंह- क्या वह मेरे कहने से देगी?
सिपाही- (हंसकर) वह तो आपके लिए जान देने को तैयार है, इतनी रकम की क्या बिसात है।
आनंद सिंह- तो क्या आज मुझे यहां से न छुड़ावेंगे?
सिपाही- नहीं, मगर आप कोई चिंता न करें, आपका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता, कल जब वह युवती आए तो उससे कहिए कि तुमसे मुहब्बत तब करूंगा जब अपने बदन का कुल जेवर और एक हजार अशर्फी यहां रख दो, उसके दूसरे दिन तुम जो-जो कहोगी मैं मानूंगा। वह तुरंत अशर्फी मंगा देगी और कुल जेवर भी उतार देगी। नालायक बड़ी मालदार है, उसे कम न समझिए।
आनंद सिंह- खैर जो कहोगे करूंगा।
सिपाही- जब तक आप यह न करेंगे, मैं आपको इस कैद से न छुड़ाऊंगा। आप यह न सोचिए कि उसे धोखा देकर या जबर्दस्ती उस राह से चले जाएंगे जिधर से वह आती-जाती है। यह कभी नहीं हो सकेगा, उसके आने-जाने के लिए कई रास्ते हैं।
आनंद सिंह- अगर वह तीन-चार दिन न आवे तब?
सिपाही- क्या हर्ज है, मैं आपकी बराबर ही सुध लेता रहूंगा और खाने-पीने को पहुंचाया करूंगा।
आनंद सिंह- अच्छा, ऐसा ही सही।
वह सिपाही कमंद लगाकर छत पर चढ़ा और दीवार फांद मकान के बाहर हो गया। थोड़ी रात बच गई थी जो आनंद सिंह ने इसी सोच-विचार में काटी कि यह कौन है, जो ऐसे वक्त में मेरी मदद को पहुंचा। इसे लालच बहुत है, कोई ऐयार मालूम पड़ता है। ऐयारों का जितना ज्यादे खर्च होता है उतना ही लालच भी करते हैं। खैर कोई हो, अब तो जो कुछ उसने कहा है करना ही पड़ेगा।
रात बीत गई, सवेरा हुआ। वह और फिर उन्हीं चारों लड़कियों को लिये आ पहुंची। देखा कि आनंद सिंह पलंग पर पड़े हैं और खाने-पीने का सामान ज्यों-का-त्यों उसी जगह रखा है जहां वह रख गई थी।
औरत- आप क्यों जिद्द करके भूखे-प्यासे अपनी जान देते हैं?
आनंद सिंह- इसी तरह मर जाऊंगा, मगर तुमसे मुहब्बत न करूंगा। हां, अगर एक बात मेरी मानो तो तुम्हारा कहा करूं।
औरत- (खुश होकर और उनके पास बैठकर) जो कहो मैं करने को तैयार हूं, मगर मुझसे जिद्द न करो।
आनंद सिंह- अपन बदन पर से कुल जेवर उतार दो और एक हजार अशर्फी मगा दो।
औरत- (आनंद सिहं के गले में हाथ डालकर) बस, इतने ही के लिए! लो, मैं अभी देती हूं!
एक हजार अशर्फी लाने के लिए उसने दो लड़कियों को कहा और अपने बदन से कुल जेवर उतार दिए। थोड़ी ही देर में वह दोनों लड़कियां अशर्फियों का तोड़ा लिए आ गईं।
औरत- लीजिए, अब आप खुश हुए? अब तो उज्र नहीं?
आनंद सिंह- नहीं, मगर एक दिन की और मोहलत मांगता हूं? कल इसी वक्त तुम आओ बस मैं तुम्हारा हो जाऊंगा।
औरत- अब यह ढकोसला क्या निकाला? आज भी भूखे-प्यासे काटोगे तो तुम्हारी क्या दशा होगी?
आनंद सिंह- इसकी फिक्र न करो, मुझे कई दिनों तक भूखे-प्यासे रहने की आदत है।
औरत- लाचार, खैर यह भी सही, ठहरिए, मैं आती हूं।
इतना कहकर आनंद सिंह को उसी जगह छोड़ चारों लड़कियों को साथ ले वह कमरे से बाहर चली गई। घंटा-भर बीतने पर भी वह न लौटी तो आनंद सिंह उठे और कमरे के बाहर जा उसे ढूंढ़ने लगे, मगर कहीं पता न लगा। बाहर की दीवार में छोटी-मोटी दो आलमारियां लगी हुई दिखाई दीं। अंदाज कर लिया कि शायद उस खिड़की की तरह यह भी बाहर जाने का कोई रास्ता हो और इधर ही से वे लोग निकल गई हों। सोच और फिक्र में तमाम दिन बिताया, पहर रात जाते-जाते कल की तरह वही सिपाही फिर पहुंचा और मेवा-दूध आनंद सिंह को दिया।
आनंद सिंह- लीजिए, आपकी फरमाइश तैयार है।
सिपाही- तो बस, अब आप भी इस मकान के बाहर चलिए। एक रोज के कष्ट में इतनी रकम हाथ आई, क्या बुरा हुआ!
सब कुछ सामान अपने कब्जे में करने के बाद सिपाही कमरे के बाहर निकला और सहन में पहुंच कमरबंद के जरिए से आनंद सिंह को मकान के बाहर निकालने के बाद आप भी बाहर हो गया। मैदान की हवा लगने से आनंद सिंह का जी ठिकाने हुआ। समझे कि अब जान बची। बाहर से देखने पर मालूम हुआ कि यह मकान एक पहाड़ी के अंदर है, कारीगरों ने पत्थर तोड़कर इसे तैयार किया है। इस मकान ने अगल-बगल में कई सुरंगे भी दिखाई पड़ी।
आनंद सिंह को लिए हुए वह सिपाही कुछ दूर चला गया जहां कसे-कसाए दो घोड़े पेड़ से बंधे थे। बोला- 'लीजिए, एक पर आप सवार होइए, दूसरे पर मैं चढ़ता हूं। चलिए, आपको घर तक पहुंचा आऊं।'
सिपाही- आपके पास क्या है जो मुझे देंगे?
आनंद सिंह- इस वक्त भी हजारों रुपए का माल मेरे बदन पर है।
सिपाही- मैं यह सब कुछ नहीं चाहता।
आनंद सिंह- फिर?
सिपाही- उसी कम्बख्त के बदन पर जो कुछ जेवर है मुझे दीजिए और एक हजार अशर्फी।
आनंद सिंह- यह कैसे हो सकेगा? वह तो यहां मौजूद नहीं और हजार अशर्फी भी कहां से आवें?
सिपाही- उसी से लेकर दीजिए।
आनंद सिंह- क्या वह मेरे कहने से देगी?
सिपाही- (हंसकर) वह तो आपके लिए जान देने को तैयार है, इतनी रकम की क्या बिसात है।
आनंद सिंह- तो क्या आज मुझे यहां से न छुड़ावेंगे?
सिपाही- नहीं, मगर आप कोई चिंता न करें, आपका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता, कल जब वह युवती आए तो उससे कहिए कि तुमसे मुहब्बत तब करूंगा जब अपने बदन का कुल जेवर और एक हजार अशर्फी यहां रख दो, उसके दूसरे दिन तुम जो-जो कहोगी मैं मानूंगा। वह तुरंत अशर्फी मंगा देगी और कुल जेवर भी उतार देगी। नालायक बड़ी मालदार है, उसे कम न समझिए।
आनंद सिंह- खैर जो कहोगे करूंगा।
सिपाही- जब तक आप यह न करेंगे, मैं आपको इस कैद से न छुड़ाऊंगा। आप यह न सोचिए कि उसे धोखा देकर या जबर्दस्ती उस राह से चले जाएंगे जिधर से वह आती-जाती है। यह कभी नहीं हो सकेगा, उसके आने-जाने के लिए कई रास्ते हैं।
आनंद सिंह- अगर वह तीन-चार दिन न आवे तब?
सिपाही- क्या हर्ज है, मैं आपकी बराबर ही सुध लेता रहूंगा और खाने-पीने को पहुंचाया करूंगा।
आनंद सिंह- अच्छा, ऐसा ही सही।
वह सिपाही कमंद लगाकर छत पर चढ़ा और दीवार फांद मकान के बाहर हो गया। थोड़ी रात बच गई थी जो आनंद सिंह ने इसी सोच-विचार में काटी कि यह कौन है, जो ऐसे वक्त में मेरी मदद को पहुंचा। इसे लालच बहुत है, कोई ऐयार मालूम पड़ता है। ऐयारों का जितना ज्यादे खर्च होता है उतना ही लालच भी करते हैं। खैर कोई हो, अब तो जो कुछ उसने कहा है करना ही पड़ेगा।
रात बीत गई, सवेरा हुआ। वह और फिर उन्हीं चारों लड़कियों को लिये आ पहुंची। देखा कि आनंद सिंह पलंग पर पड़े हैं और खाने-पीने का सामान ज्यों-का-त्यों उसी जगह रखा है जहां वह रख गई थी।
औरत- आप क्यों जिद्द करके भूखे-प्यासे अपनी जान देते हैं?
आनंद सिंह- इसी तरह मर जाऊंगा, मगर तुमसे मुहब्बत न करूंगा। हां, अगर एक बात मेरी मानो तो तुम्हारा कहा करूं।
औरत- (खुश होकर और उनके पास बैठकर) जो कहो मैं करने को तैयार हूं, मगर मुझसे जिद्द न करो।
आनंद सिंह- अपन बदन पर से कुल जेवर उतार दो और एक हजार अशर्फी मगा दो।
औरत- (आनंद सिहं के गले में हाथ डालकर) बस, इतने ही के लिए! लो, मैं अभी देती हूं!
एक हजार अशर्फी लाने के लिए उसने दो लड़कियों को कहा और अपने बदन से कुल जेवर उतार दिए। थोड़ी ही देर में वह दोनों लड़कियां अशर्फियों का तोड़ा लिए आ गईं।
औरत- लीजिए, अब आप खुश हुए? अब तो उज्र नहीं?
आनंद सिंह- नहीं, मगर एक दिन की और मोहलत मांगता हूं? कल इसी वक्त तुम आओ बस मैं तुम्हारा हो जाऊंगा।
औरत- अब यह ढकोसला क्या निकाला? आज भी भूखे-प्यासे काटोगे तो तुम्हारी क्या दशा होगी?
आनंद सिंह- इसकी फिक्र न करो, मुझे कई दिनों तक भूखे-प्यासे रहने की आदत है।
औरत- लाचार, खैर यह भी सही, ठहरिए, मैं आती हूं।
इतना कहकर आनंद सिंह को उसी जगह छोड़ चारों लड़कियों को साथ ले वह कमरे से बाहर चली गई। घंटा-भर बीतने पर भी वह न लौटी तो आनंद सिंह उठे और कमरे के बाहर जा उसे ढूंढ़ने लगे, मगर कहीं पता न लगा। बाहर की दीवार में छोटी-मोटी दो आलमारियां लगी हुई दिखाई दीं। अंदाज कर लिया कि शायद उस खिड़की की तरह यह भी बाहर जाने का कोई रास्ता हो और इधर ही से वे लोग निकल गई हों। सोच और फिक्र में तमाम दिन बिताया, पहर रात जाते-जाते कल की तरह वही सिपाही फिर पहुंचा और मेवा-दूध आनंद सिंह को दिया।
आनंद सिंह- लीजिए, आपकी फरमाइश तैयार है।
सिपाही- तो बस, अब आप भी इस मकान के बाहर चलिए। एक रोज के कष्ट में इतनी रकम हाथ आई, क्या बुरा हुआ!
सब कुछ सामान अपने कब्जे में करने के बाद सिपाही कमरे के बाहर निकला और सहन में पहुंच कमरबंद के जरिए से आनंद सिंह को मकान के बाहर निकालने के बाद आप भी बाहर हो गया। मैदान की हवा लगने से आनंद सिंह का जी ठिकाने हुआ। समझे कि अब जान बची। बाहर से देखने पर मालूम हुआ कि यह मकान एक पहाड़ी के अंदर है, कारीगरों ने पत्थर तोड़कर इसे तैयार किया है। इस मकान ने अगल-बगल में कई सुरंगे भी दिखाई पड़ी।
आनंद सिंह को लिए हुए वह सिपाही कुछ दूर चला गया जहां कसे-कसाए दो घोड़े पेड़ से बंधे थे। बोला- 'लीजिए, एक पर आप सवार होइए, दूसरे पर मैं चढ़ता हूं। चलिए, आपको घर तक पहुंचा आऊं।'
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