15 जनवरी, 2010

ज़ेन गुरु और साइकिल

एक जेन गुरु ने देखा कि उनके पांच शिष्य बाहर से अपनी-अपनी साइकिलों पर लौट रहे हैं। जब वे साइकिलों से उतर गए, तब गुरु ने उनसे पूछा, ‘तुम सब साइकिलें क्यों चलाते हो?’ पहले शिष्य ने उत्तर या, ‘मेरी साइकिल पर आलुओं का बोरा बंधा है। इससे मुझे उसे अपनी पीठ पर नहीं ढोना पड़ता।’

गुरु ने कहा, ‘तुम बहुत होशियार हो। जब तुम बूढ़े हो जाओगे, तो तुम्हें मेरी तरह झुककर नहीं चलना पड़ेगा।’ दूसरे शिष्य ने उत्तर दिया, ‘मुझे साइकिल चलाते समय पेड़ों और खेतों को देखना अच्छा लगता है।’ गुरु मुस्कुराए और बोले, ‘तुम हमेशा अपनी आंखें खुली रखते हो और दुनिया को देखते हो।’ तीसरा शिष्य बोला, ‘जब मैं साइकिल चलाता हूं, तब मंत्रों का जाप करता रहता हूं।’ गुरु ने उसे शाबाशी दी, ‘तुम्हारा मन किसी नए कसे हुए पहिए की तरह रमा रहेगा।’



चौथा शिष्य बोला, ‘साइकिल चलाने पर मैं सभी जीवों से एकात्मकता अनुभव करता हूं।’ गुरु प्रसन्न हुए और बोले, ‘तुम अहिंसा के स्वर्णिम पथ पर बढ़ रहे हो।’ पांचवे शिष्य ने उत्तर दिया, ‘मैं साइकिल चलाने के लिए साइकिल चलाता हूं।’ गुरु उठकर पांचवे शिष्य के चरणों में बैठ गए और बोले, ‘मैं आपका शिष्य हूं।’

2 टिप्‍पणियां:

  1. शायद यह कुछ ऐसा है कि हमें से कई, केवल ब्लॉगिंग के लिये ब्लॉगिंग करते हैं।

    लेकिन यह हमेशा सच नहीं हो सकता। खाते हैं कि जी सकें। शायद कुछ के लिये, जीते हैं कि खा सकें।

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